बहुत हुआ चुपचाप रहना; देखकर मुंह मोड़ लेना ..
वक़्त मांग रहा हमसे हिसाब ..
किस ओर रहेंगे हम आज ...
एक ओर हैं वो जो आदमी की शक्ल में पिस्सू हैं ...
खून पीते हैं कमज़ोर-लाचार का .. फिर भी 'आदरणीय' हैं ...
दूसरी ओर हैं वो जो अब भी राह देख रहे हैं आज़ादी की ..
मुट्ठी भर अनाज और चुल्लू भर साफ़ पानी की ..
ढकोसले का वक़्त गया ..
अब वक़्त है चुनने का ..
सिर्फ अपने लिए जीने का या दूसरों के लिए मरने का ...
सवाल 'देश' का होता तो इसे ज़मीन का टुकड़ा सोचकर टाल देते ...
हम भी नुमाइंदों को गाली देकर मखमली चादर से सर ढाक लेते ...
पर जब आदमी से आदमी बने रहने का हक़ छीन लिया जाए -
उसकी बुनियादी ज़रुरत - दाना-पानी भी उसे न मिल पाए ...
तो हमारा आपका खून खौलना चाहिए , बाज़ू फड़कने चाहिए - आवाज़ उठनी चाहिए ..
जो ये सब न हो सके तो खुद को इंसान तो क्या जानवर कहना भी छोड़ देना चाहिए ..

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