Tuesday, August 3, 2010

मेरे प्रेरणा-स्रोत  

अप्रतिम सौंदर्य से ओत-प्रोत, हे मेरी प्रिय प्रेरणा-स्रोत !
तुमको है समर्पित मेरी लेखनी कि ये उज्जवल ज्योत।

तुम्हारे विधु-मुख के दर्शन, शीतल करते मेरा कण- कण;
कजरारे सुन्दर कमल-नयन; देते हैं मुझको नवजीवन,
तुम पर न्योछावर है मेरे जीवन का प्रतिक्षण।

तुम्हारी मुस्कान की एक झलक ज्येष्ठ में, श्रावण का आभास कराती है,
तुम्हारे केशों की मोहक छवि, मुझे चैन की नींद सुलाती है;
तुमसे विछोह की कल्पना-मात्र मेरे ह्रदय को विदीर्ण कर जाती है।

मेरी स्वप्न- वाटिका में कभी तो अपने पग धरो;
मेरे आशा- पुष्पों को अपनी स्नेह-धारा से सिंचित करो -
देकर प्रेम का महादान इस मूरख- निर्बल पर दया करो।

तुममें खोने की है आकांक्षा, दूजा नहीं मेरे मन में खोट;
साहस करो, विश्वास करो; हे मेरी प्रिय प्रेरणा-स्रोत॥

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