Tuesday, August 3, 2010

समर्पण 


अंधेरे में लजाता आपका मुख-मंडल -मानो पूर्णिमा की रात्रि हो 
और मेघों में प्रच्छन्न विधु किसी कवि को झाँक झाँककर नई रचना की प्रेरणा दे रहा था।

स्रष्टि की सम्पूर्ण रसना समेटे आपके पुष्प-वर्णीय अधर ;
मेरे संयम की परीक्षा का सर्वाधिक दुःसाध्य प्रश्न बन गए।

उस शांत वातावरण में आपके नेत्रों की चंचलता - 
उनके खुलने, झुकने और बंद होने के साथ बढ़ती मेरी व्यग्रता।

वही अन्धकार, वही क्षण और उस घटनाक्रम के सर्वाधिक महत्वपूर्ण पात्र - आप,
 मेरे जीवन- रुपी नाट्य का सर्वाधिक स्मरणार्थ अंक बन गए हैं।

आशा है शीघ्र ही प्रति-दिन इसी भांति ये अंक खेला जायेगा 
एवं मेरे मन के भाव कठपुतली सरीखे आपके अनकहे शब्दों द्वारा नियंत्रित हो जायेंगे- 
उस समर्पण में ही जीवन का वो सुख है जो स्वच्छंद होकर कोई क्रीड़ा करने में नहीं।

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