Friday, August 27, 2010

                           
बहुत हुआ चुपचाप रहना; देखकर मुंह मोड़ लेना .. 
वक़्त मांग रहा हमसे हिसाब .. 
किस ओर रहेंगे हम आज ... 


एक ओर हैं वो जो आदमी की शक्ल में पिस्सू हैं ... 
खून पीते हैं कमज़ोर-लाचार का .. फिर भी 'आदरणीय' हैं ...
दूसरी ओर हैं वो जो अब भी राह देख रहे हैं आज़ादी की .. 
मुट्ठी भर अनाज और चुल्लू भर साफ़ पानी की ..

ढकोसले का वक़्त गया .. 
अब वक़्त है चुनने का ..
सिर्फ अपने लिए जीने का या दूसरों के लिए मरने का ... 

सवाल 'देश' का होता तो इसे ज़मीन का टुकड़ा सोचकर टाल देते ... 
हम  भी नुमाइंदों को गाली देकर मखमली चादर से सर ढाक लेते ...

पर जब आदमी से आदमी बने रहने का हक़ छीन लिया जाए - 
उसकी बुनियादी ज़रुरत - दाना-पानी भी उसे न मिल पाए ...
तो हमारा आपका खून खौलना चाहिए , बाज़ू फड़कने चाहिए - आवाज़ उठनी चाहिए .. 
जो ये सब न हो सके तो खुद को इंसान तो क्या जानवर कहना भी छोड़ देना चाहिए .. 

Monday, August 23, 2010


सुख और दुःख, जीवन और अस्तित्व, पीड़ा और मुक्ति, भय और निडरता;
छोरों के मध्य की दूरी तुमसे मिलने पर स्पष्ट दिखाई दी है.

चरित्र और कुचरित्र का खड्गयुद्ध, कामना और आत्मसंयम का मल्ल;
तुमसे मिलने पर प्रति पग एक नयी ध्वनि सुनायी दी है.

यदि तुम भी ये ध्वनियाँ सुन सकते - ये द्रश्य देख सकते;
तो जानते क्यूँ मेरे मुखमंडल पर व्यग्रता छाई सी है.

तुमको सर्वे-सर्वा मानकर वर्तमान के धरातल पर स्वप्नों का संसार रचाया है;
किन्तु तुम्हारी अनुपस्थिति में इस संसार में अव्यवस्था ही अभिभावी हो पाई है.  

तुम तक मनोभाव प्रेषित करने की ओर जब भी हुआ अग्रसर;
पैरों में; समय, समाज, रीति की; निरंतर ही नयी बेड़ी कसी पाई है. 

Tuesday, August 10, 2010

क्या विचारों को प्रेषित करने का साहस ही सच्चे प्रेम का मापदंड है?
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अव्यक्त विचारों को आज स्याही का सहारा मिला है
इनमें प्रच्छन्न प्रेम का बोध कर इन्हें अभिव्यक्ति दे दो

मेरे स्वप्नों में तुम संग बिताये काल्पनिक-क्षणों को
अपने नटखट- चक्षुओं से अवलोकित कर धन्य कर दो

अथक प्रयासों से समय-शिला पर एक मूर्ति उकेरी है
तुम्हें सदा देवांश है माना - अहल्या को जीवंत कर दो

कल्पना-जन्य ही सही, ये शब्द मेरे ह्राद्यांश हैं
आलिंगन-बद्ध करो या दुत्कारो - मेरे अस्तित्व को स्वीकृति दे दो

Thursday, August 5, 2010

बादल 


गगन पर किसने उकेरे ये बादल?
नीले-सागर पर किसने बिखेरे ये बादल? 


कभी रजत-पुंज, कभी विधु-खंड 
कैसे रूप बदलते हैं बादल ||


किसान, शुष्क भूमि, पशु-पक्षी
सभी राह तकते - कब आयेंगे बादल ||


कवि, रंगसाज, नाट्यकार, गीतकार 
कल्पना-वर्धक, ये बादल ||


सूर्यास्त या चंद्रोदय -
करें द्रश्य मनोहर, ये बादल ||


ज्येष्ठ-अपराह्न की सूर्याग्नि में
निर्धन की छतरी - ये बादल ||

Tuesday, August 3, 2010

अम्मा 


उन स्वप्नों ने, उन वचनों ने, अनुत्तरित प्रश्नों ने - आज पुनः अंतर्मन को झकझोरा है अम्मा! 

तुम्हारी हथेली की थपकी ने, तुमने जो दी उस घुड़की ने- आज पुनः न जाने क्यों फिर टोका है अम्मा! 

रजनी के अंधियारे ने; भोर के उजियारे ने- पुनः तुम्हारे स्पर्श की ओर खींचा है अम्मा! 

परीक्षा की बेला में मेरे मन की इस चंचलता ने- पुनः तुम्हारे अनुशासन को तोड़ा है अम्मा!
 
कहने को तो आनंदित हैं, लक्ष्य पर सकेंद्रित हैं- पर जीवन के रीतेपन ने तुम्हें ही ढूँढा है अम्मा!
मेरे प्रेरणा-स्रोत  

अप्रतिम सौंदर्य से ओत-प्रोत, हे मेरी प्रिय प्रेरणा-स्रोत !
तुमको है समर्पित मेरी लेखनी कि ये उज्जवल ज्योत।

तुम्हारे विधु-मुख के दर्शन, शीतल करते मेरा कण- कण;
कजरारे सुन्दर कमल-नयन; देते हैं मुझको नवजीवन,
तुम पर न्योछावर है मेरे जीवन का प्रतिक्षण।

तुम्हारी मुस्कान की एक झलक ज्येष्ठ में, श्रावण का आभास कराती है,
तुम्हारे केशों की मोहक छवि, मुझे चैन की नींद सुलाती है;
तुमसे विछोह की कल्पना-मात्र मेरे ह्रदय को विदीर्ण कर जाती है।

मेरी स्वप्न- वाटिका में कभी तो अपने पग धरो;
मेरे आशा- पुष्पों को अपनी स्नेह-धारा से सिंचित करो -
देकर प्रेम का महादान इस मूरख- निर्बल पर दया करो।

तुममें खोने की है आकांक्षा, दूजा नहीं मेरे मन में खोट;
साहस करो, विश्वास करो; हे मेरी प्रिय प्रेरणा-स्रोत॥

योद्धा  

रात के निबिड़ अन्धकार को चीरते हुए दीपक ; 
मरघट से सन्नाटे में दूर कहीं, बैलों के गले में बंधी घंटियों की सरगम; 
कालिमा को चुनौती देते चन्द्रमा और नक्षत्र - 
कौन कहता है कि गाँवों में रात शिथिल होती है ?


ये सब मात्र विरोधाभास नहीं; उस संघर्ष की ओर इंगित करते हैं 
जो स्वर्ण-पुरूष का आगमन होते ही किसी को खेत में; 
किसी को घर के चूल्हे के आगे; किसी को कतरनी पर; किसी को बाग में करना होगा।


क्यूंकि हमारी पुस्तकों के प्रष्ठ भले ही रक्त-रंजित युद्धों का बखान करें 
असल युद्ध तो कृषक खेत में, मौसम की रुखाई से; 
स्त्रियाँ घर में चूल्हे के आगे झुलसाने वाली गर्मी से और कहीं कोई निर्धन अपने रोग से लड़ता है।


योद्धाओं को देखने किसी छावनी में जाने की आवश्यकता ही क्या 
जब हमारे-आपके बीच ऐसे-ऐसे योद्धा मौजूद हैं जो हर दिन अस्तित्व का युद्ध लड़ते हैं - 
अपने लिए और अपने परिवार के लिए।
जाना हो तो जाओ  !


जाना हो तो जाओ मगर कुछ पढ़ते- सुनते जाओ; मेरे भावों के उद्वेग को दो क्षण देखते जाओ।

तुमने मेरे मन में आशा का जो बीज बोया था अब पौधा हो चला है- जाना हो तो जाओ; जड़ों में मट्ठा देकर जाओ।

साथ तुम्हारे हुमको कुछ, लक्ष्य मिले; नए उद्येश्य मिले- जाना हो तो जाओ; नए ध्येय सुझाते जाओ।

तुम्हारी सहायता से अपना एक रूप, पीछे छोड़कर आए हैं - जाना हो तो जाओ सत्मार्ग दिखाते जाओ।

अब तक की सहयात्रा से अनेक मधुर स्म्रतियाँ जुड़ बैठी हैं - जाना हो तो जाओ; इनकी हत्या करते जाओ।
पत्थर 


पत्थर को देखा-समुद्र के किनारे 
लहरों के थपेड़े सहता हुआ एकाकी खड़ा है।
उस से जुड़े  जाने कितने पाषाण- कण 
लहरों के वेग से प्रभावित होकर उसका साथ छोड़ गए; 
परन्तु वह अडिग है।

कदाचित इस आशा में कि 
कभी कोई साथी धारा के विपरीत प्रवाह कर साथ  मिलेगा। 
परन्तु वह जानता है कि साथ लगने वाले कण भी 
क्षण भर के साथ के उपरांत पुनः समुद्र की ओर खिचे चले जायेंगे।
समर्पण 


अंधेरे में लजाता आपका मुख-मंडल -मानो पूर्णिमा की रात्रि हो 
और मेघों में प्रच्छन्न विधु किसी कवि को झाँक झाँककर नई रचना की प्रेरणा दे रहा था।

स्रष्टि की सम्पूर्ण रसना समेटे आपके पुष्प-वर्णीय अधर ;
मेरे संयम की परीक्षा का सर्वाधिक दुःसाध्य प्रश्न बन गए।

उस शांत वातावरण में आपके नेत्रों की चंचलता - 
उनके खुलने, झुकने और बंद होने के साथ बढ़ती मेरी व्यग्रता।

वही अन्धकार, वही क्षण और उस घटनाक्रम के सर्वाधिक महत्वपूर्ण पात्र - आप,
 मेरे जीवन- रुपी नाट्य का सर्वाधिक स्मरणार्थ अंक बन गए हैं।

आशा है शीघ्र ही प्रति-दिन इसी भांति ये अंक खेला जायेगा 
एवं मेरे मन के भाव कठपुतली सरीखे आपके अनकहे शब्दों द्वारा नियंत्रित हो जायेंगे- 
उस समर्पण में ही जीवन का वो सुख है जो स्वच्छंद होकर कोई क्रीड़ा करने में नहीं।