Monday, August 23, 2010
सुख और दुःख, जीवन और अस्तित्व, पीड़ा और मुक्ति, भय और निडरता;
छोरों के मध्य की दूरी तुमसे मिलने पर स्पष्ट दिखाई दी है.
चरित्र और कुचरित्र का खड्गयुद्ध, कामना और आत्मसंयम का मल्ल;
तुमसे मिलने पर प्रति पग एक नयी ध्वनि सुनायी दी है.
यदि तुम भी ये ध्वनियाँ सुन सकते - ये द्रश्य देख सकते;
तो जानते क्यूँ मेरे मुखमंडल पर व्यग्रता छाई सी है.
तुमको सर्वे-सर्वा मानकर वर्तमान के धरातल पर स्वप्नों का संसार रचाया है;
किन्तु तुम्हारी अनुपस्थिति में इस संसार में अव्यवस्था ही अभिभावी हो पाई है.
तुम तक मनोभाव प्रेषित करने की ओर जब भी हुआ अग्रसर;
पैरों में; समय, समाज, रीति की; निरंतर ही नयी बेड़ी कसी पाई है.
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