Sunday, September 23, 2012

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I have converted this blog to a Facebook Page titled आभास की क़लम से (From Abhas's Pen) available on: https://www.facebook.com/abhaskks. Request you to visit and 'like' the Facebook Page (in order) to access my old works and receive notifications of my new works. In due course I'll delete this blog. Thanks. 

Monday, August 27, 2012

मृत्यु


प्रतिबिम्ब एक अनेक द्रश्य हैं   
मृत्यु तुम्हारे अनेक पक्ष हैं
तुम विशालतम स्त्रोत भय का 
तुम अवश्यम्भावी घटना हो
तुम अनुस्मारक क्षणिक-जीवन का
तुम अपरिवर्तनीय अंत हो 
तुम विपर्यय उत्पत्ति का 
तुम स्थायित्व उपशब्द हो
चेष्टा एक अनेक कृत्य हैं  
मृत्यु तुम्हारे अनेक पक्ष हैं 

Wednesday, August 1, 2012

Cast . Me . Aside

Now that you've cast me into the rough seas and walked away, 
all I have to hold on to, is the wreckage of our shared past.
The past that has given me sweetest memories,
to be cherished for the rest of my wretched life.
  

Monday, October 3, 2011

फ़िरोज़ 

झिलमिलाते चिराग़ों के मानिंद धुंधले सूरज का झिलमिलाना;
सर्द झोंकों संग फ़िज़ा में ताज़े गुड का घुल जाना;
साग-रोटी, उल्फ़त लबालब, लज्ज़त भरा आब-ओ-दाना;
मुसलसल फ़िरोज़ तातील-गुज़ारी क्या खूब था वो ज़माना | 

Sunday, July 31, 2011


मेरे मन


कभी-कभी लक्ष्य-प्राप्ति की प्रक्रिया में शरीर सशक्त,
परन्तु मन क्लांत प्रतीत होता है; 
ऐसे अवसर पर, हम 'मन' से प्रश्न करते हैं: 

मेरे मन, क्या चाहते हो तुम?

जब जीवन को जीते-जीते, जीना भूल गए थे, 
उस जीवन को पीछे छोड़ चुके हैं हम |

शीशे के पिंजरे से जब विधु को ताका करते थे, 
उन रातों को गत वर्ष ही भूल चुके हैं हम |

सूर्योदय-सूर्यास्त में अंतर जब धुंधलाया था,
उस चरण-भंवर को भी तो जीत चुके हैं हम |

समक्ष हमारे अवसर-फल लदे वृक्षों का वन है,
बाँध टोकरी, कस कमर, कूच कर चुके हैं हम |   

तुम ही सेनापति, तुम ही कूटनीतिज्ञ हो,
अविचलित होकर राह दिखाओ, सज्जित-तत्पर हैं हम | 

Friday, November 26, 2010

रास्ते की धूल थमने के बाद, कारवाँ के आँखों से ओझल होने के बाद,
किवाड़ के सटने और भावों के ठहरने के बाद;
आज मन में एक प्रश्न उठा - क्या अधिक अप्रीतिकर है?



तुम्हारी अनुपस्थिति अथवा विगत-निकटता की स्मृति ? 
अनुपस्थिति अपनी स्थिर-समीपता से कुछ सांत्वना तो देती है; 
परन्तु, स्मृति, अमूर्त होकर भी, प्रति-क्षण जीवन की न्यूनता सुस्पष्ट करती रहती है.

Monday, September 13, 2010

जीवन-ग्रन्थ का एक अध्याय समाप्त हो गया |
अँकुर फूटने से पूर्व तुषारापात हो गया |

सुख-चन्द्रिका को गवाक्ष से निहारा ही था, आस्वादन से पूर्व चंद्रहास हो गया |
था आशाओं का सूर्य उदित ही हुआ, संतुष्टि-रश्मि बिखरने से पूर्व आकाश आच्छन्न हो गया |

कभी नीरसता से खिन्न था मन, अब अनिश्चितता से चित्त-शांति का नाश हो गया |   
ह्रदय-हिमानी से प्रेम-धारा बही भर ही थी, दुर्भाग्य-प्रस्तर से बाँध का निर्माण हो गया |

जिस चोटी को विजित मान बैठे थे हम, अन्य का उस पर अधिकार हो गया |
प्रेमालय का प्रथम खंड निर्मित होते ही, संदेह-भूचाल से सर्व-विध्वंस हो गया |

गीत में स्वर-माधुर्य को अथक प्रयास करे, वीणा- मुरली का राग रसहीन हो गया |
सुखद अंत रचने की मंशा थी किन्तु, उपन्यास में स्वच्छंदतावाद का पक्ष निष्प्रभ हो गया |

जीवन-ग्रन्थ का एक अध्याय समाप्त हो गया |
अँकुर फूटने से पूर्व तुषारापात हो गया |