रास्ते की धूल थमने के बाद, कारवाँ के आँखों से ओझल होने के बाद,
किवाड़ के सटने और भावों के ठहरने के बाद;
आज मन में एक प्रश्न उठा - क्या अधिक अप्रीतिकर है?
अनुपस्थिति अपनी स्थिर-समीपता से कुछ सांत्वना तो देती है;
परन्तु, स्मृति, अमूर्त होकर भी, प्रति-क्षण जीवन की न्यूनता सुस्पष्ट करती रहती है.

bhaiya... aakhir ye kaun si maansik vedana hai wo akhsar ruup me pratak ho rahi hai
ReplyDelete