Sunday, July 31, 2011


मेरे मन


कभी-कभी लक्ष्य-प्राप्ति की प्रक्रिया में शरीर सशक्त,
परन्तु मन क्लांत प्रतीत होता है; 
ऐसे अवसर पर, हम 'मन' से प्रश्न करते हैं: 

मेरे मन, क्या चाहते हो तुम?

जब जीवन को जीते-जीते, जीना भूल गए थे, 
उस जीवन को पीछे छोड़ चुके हैं हम |

शीशे के पिंजरे से जब विधु को ताका करते थे, 
उन रातों को गत वर्ष ही भूल चुके हैं हम |

सूर्योदय-सूर्यास्त में अंतर जब धुंधलाया था,
उस चरण-भंवर को भी तो जीत चुके हैं हम |

समक्ष हमारे अवसर-फल लदे वृक्षों का वन है,
बाँध टोकरी, कस कमर, कूच कर चुके हैं हम |   

तुम ही सेनापति, तुम ही कूटनीतिज्ञ हो,
अविचलित होकर राह दिखाओ, सज्जित-तत्पर हैं हम | 

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