परन्तु मन क्लांत प्रतीत होता है;
ऐसे अवसर पर, हम 'मन' से प्रश्न करते हैं:
मेरे मन, क्या चाहते हो तुम?
जब जीवन को जीते-जीते, जीना भूल गए थे,
उस जीवन को पीछे छोड़ चुके हैं हम |
शीशे के पिंजरे से जब विधु को ताका करते थे,
उन रातों को गत वर्ष ही भूल चुके हैं हम |
सूर्योदय-सूर्यास्त में अंतर जब धुंधलाया था,
उस चरण-भंवर को भी तो जीत चुके हैं हम |
समक्ष हमारे अवसर-फल लदे वृक्षों का वन है,
बाँध टोकरी, कस कमर, कूच कर चुके हैं हम |
तुम ही सेनापति, तुम ही कूटनीतिज्ञ हो,
अविचलित होकर राह दिखाओ, सज्जित-तत्पर हैं हम |
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