Tuesday, August 3, 2010

पत्थर 


पत्थर को देखा-समुद्र के किनारे 
लहरों के थपेड़े सहता हुआ एकाकी खड़ा है।
उस से जुड़े  जाने कितने पाषाण- कण 
लहरों के वेग से प्रभावित होकर उसका साथ छोड़ गए; 
परन्तु वह अडिग है।

कदाचित इस आशा में कि 
कभी कोई साथी धारा के विपरीत प्रवाह कर साथ  मिलेगा। 
परन्तु वह जानता है कि साथ लगने वाले कण भी 
क्षण भर के साथ के उपरांत पुनः समुद्र की ओर खिचे चले जायेंगे।

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