पत्थर
पत्थर को देखा-समुद्र के किनारे
लहरों के थपेड़े सहता हुआ एकाकी खड़ा है।
उस से जुड़े न जाने कितने पाषाण- कण
लहरों के वेग से प्रभावित होकर उसका साथ छोड़ गए;
परन्तु वह अडिग है।
कदाचित इस आशा में कि
कभी कोई साथी धारा के विपरीत प्रवाह कर साथ आ मिलेगा।
परन्तु वह जानता है कि साथ लगने वाले कण भी
क्षण भर के साथ के उपरांत पुनः समुद्र की ओर खिचे चले जायेंगे।

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