Monday, September 13, 2010


है द्रश्य यह वेदना का 
पर तुम व्यथित ना होना
कर्म हवन में तुम 
एक और आहुति चढ़ा देना 

है अपनों से दूर तू 
पर खुद से न दूर होना
ह्रदय की पीड़ा को चीर कर
सबको प्रेम देना 


डूब रहा सूरज है 
पर तुम नहीं रुकना
अपने विशवास के प्रकाश से
कर्म पथ सफल करना 

परम प्रकाश आत्मा का
तुम हरगिज़ न भुजने देना
जो असफल हो जाये 
उस प्रयास के बाद एक और प्रयास करना !

नगेन्द्र प्रताप 'बाबा'

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